​चांद का कुर्ता -रामधारी सिंह दिनकर

 हठ कर बैठा चांद एक दिन, माता से यह बोला,
 “सिलवा दो मां, मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला।

 

सन-सन चलती हवा रात भर, जाड़े से मरता हूं,

ठिठुर-ठिठुर कर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूं।

 

आसमान का सफर और यह मौसम है जाड़े का,

न हो अगर तो ला दो, कुर्ता ही कोई भाड़े का।”

 

बच्चे की सुन बात कहा माता ने, ” अरे सलोने,

कुशल करें भगवान, लगें मत तुझको जादू-टोने।

 

जाड़े की तो बात ठीक है, पर मैं तो डरती हूं,

एक नाप में कभी नहीं तुझको देखा करती हूं।

 

कभी एक अंगुल भर चौड़ा, कभी एक फुट मोटा,

बड़ा किसी दिन हो जाता है और किसी दिन छोटा।

 

घटता बढ़ता रोज, किसी दिन ऐसा भी करता है,

नहीं किसी की आंखों को दिखलाई पड़ता है।

 

अब तू ही तो बता, नाप तेरा किस रोज लिवायें,

सीं दें एक झिंगोला जो हर दिन बदन में आये।”

ऐसे मैं मन बहलाता हूँ – हरिवंशराय बच्चन (Aise mai mann behlaata hoon – Harivansh Rai Bachhan)


​सोचा करता बैठ अकेले,

गत जीवन के सुख-दुख झेले,

दंशनकारी सुधियों से मैं उर के छाले सहलाता हूँ!

ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!
नहीं खोजने जाता मरहम,

होकर अपने प्रति अति निर्मम,

उर के घावों को आँसू के खारे जल से नहलाता हूँ!

ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!
आह निकल मुख से जाती है,

मानव की ही तो छाती है,

लाज नहीं मुझको देवों में यदि मैं दुर्बल कहलाता हूँ!

ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!

ध्वज-वंदना – रामधारी सिंह “दिनकर” (Dhwaj Vandana- Ramdhari Singh “Dinkar”)


नमो, नमो, नमो…
नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो!

नमो नगाधिराज-शृंग की विहारिणी!

नमो अनंत सौख्य-शक्ति-शील-धारिणी!

प्रणय-प्रसारिणी, नमो अरिष्ट-वारिणी!

नमो मनुष्य की शुभेषणा-प्रचारिणी!

नवीन सूर्य की नई प्रभा, नमो, नमो!

नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो!
हम न किसी का चाहते तनिक, अहित, अपकार

प्रेमी सकल जहान का भारतवर्ष उदार

सत्य न्याय के हेतु, फहर फहर ओ केतु

हम विरचेंगे देश-देश के बीच मिलन का सेतु

पवित्र सौम्य, शांति की शिखा, नमो, नमो!

नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो!
तार-तार में हैं गुंथा ध्वजे, तुम्हारा त्याग

दहक रही है आज भी, तुम में बलि की आग

सेवक सैन्य कठोर, हम चालीस करोड़

कौन देख सकता कुभाव से ध्वजे, तुम्हारी ओर

करते तव जय गान, वीर हुए बलिदान

अंगारों पर चला तुम्हें ले सारा हिन्दुस्तान!

प्रताप की विभा, कृषानुजा, नमो, नमो!
नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो!

हमारे कृषक -रामधारी सिंह “दिनकर” (Hamaare Krishak -Ramdhari Singh “Dinkar”)

​जेठ हो कि हो पूस, हमारे कृषकों को आराम नहीं है 

छूटे कभी संग बैलों का ऐसा कोई याम नहीं है 
मुख में जीभ शक्ति भुजा में जीवन में सुख का नाम नहीं है 

वसन कहाँ? सूखी रोटी भी मिलती दोनों शाम नहीं है 
बैलों के ये बंधू वर्ष भर क्या जाने कैसे जीते हैं 

बंधी जीभ, आँखें विषम गम खा शायद आँसू पीते हैं 
पर शिशु का क्या, सीख न पाया अभी जो आँसू पीना 

चूस-चूस सूखा स्तन माँ का, सो जाता रो-विलप नगीना 
विवश देखती माँ आँचल से नन्ही तड़प उड़ जाती 

अपना रक्त पिला देती यदि फटती आज वज्र की छाती 
कब्र-कब्र में अबोध बालकों की भूखी हड्डी रोती  है 

दूध-दूध की कदम-कदम पर सारी रात होती है 
दूध-दूध औ वत्स मंदिरों में बहरे पाषान यहाँ है 

दूध-दूध तारे बोलो इन बच्चों के भगवान कहाँ हैं 
दूध-दूध गंगा तू ही अपनी पानी को दूध बना दे 

दूध-दूध उफ कोई है तो इन भूखे मुर्दों को जरा मना दे 
दूध-दूध दुनिया सोती है लाऊँ दूध कहाँ किस घर से 

दूध-दूध हे देव गगन के कुछ बूँदें टपका अम्बर से 
हटो व्योम के, मेघ पंथ से स्वर्ग लूटने हम आते हैं 

दूध-दूध  हे वत्स!  तुम्हारा दूध खोजने हम जाते हैं

कथनी – करणी का अंग -कबीर (kathni karni ka ang by Kabir)

जैसी मुख तैं नीकसै, तैसी चालै चाल।
पारब्रह्म नेड़ा रहै, पल में करै निहाल॥

पद गाए मन हरषियां, साँखी कह्यां अनंद।
सो तत नांव न जाणियां, गल में पड़िया फंद॥

मैं जाण्यूं पढिबौ भलो, पढ़बा थैं भलौ जोग।
राम-नाम सूं प्रीति करि, भल भल नींदौ लोग॥

`कबीर’ पढ़िबो दूरि करि, पुस्तक देइ बहाई।
बावन आखर सोधि करि, `ररै’ `ममै’ चित्त लाई॥

पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढ़ाई आखर प्रेम का, पढ़ै सो पंडित होइ॥

करता दीसै कीरतन, ऊँचा करि-करि तुंड।
जानें-बूझै कुछ नहीं, यौं हीं आंधा रूंड॥