​चांद का कुर्ता -रामधारी सिंह दिनकर

 हठ कर बैठा चांद एक दिन, माता से यह बोला,
 “सिलवा दो मां, मुझे ऊन का मोटा एक झिंगोला।

 

सन-सन चलती हवा रात भर, जाड़े से मरता हूं,

ठिठुर-ठिठुर कर किसी तरह यात्रा पूरी करता हूं।

 

आसमान का सफर और यह मौसम है जाड़े का,

न हो अगर तो ला दो, कुर्ता ही कोई भाड़े का।”

 

बच्चे की सुन बात कहा माता ने, ” अरे सलोने,

कुशल करें भगवान, लगें मत तुझको जादू-टोने।

 

जाड़े की तो बात ठीक है, पर मैं तो डरती हूं,

एक नाप में कभी नहीं तुझको देखा करती हूं।

 

कभी एक अंगुल भर चौड़ा, कभी एक फुट मोटा,

बड़ा किसी दिन हो जाता है और किसी दिन छोटा।

 

घटता बढ़ता रोज, किसी दिन ऐसा भी करता है,

नहीं किसी की आंखों को दिखलाई पड़ता है।

 

अब तू ही तो बता, नाप तेरा किस रोज लिवायें,

सीं दें एक झिंगोला जो हर दिन बदन में आये।”

ध्वज-वंदना – रामधारी सिंह “दिनकर” (Dhwaj Vandana- Ramdhari Singh “Dinkar”)


नमो, नमो, नमो…
नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो!

नमो नगाधिराज-शृंग की विहारिणी!

नमो अनंत सौख्य-शक्ति-शील-धारिणी!

प्रणय-प्रसारिणी, नमो अरिष्ट-वारिणी!

नमो मनुष्य की शुभेषणा-प्रचारिणी!

नवीन सूर्य की नई प्रभा, नमो, नमो!

नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो!
हम न किसी का चाहते तनिक, अहित, अपकार

प्रेमी सकल जहान का भारतवर्ष उदार

सत्य न्याय के हेतु, फहर फहर ओ केतु

हम विरचेंगे देश-देश के बीच मिलन का सेतु

पवित्र सौम्य, शांति की शिखा, नमो, नमो!

नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो!
तार-तार में हैं गुंथा ध्वजे, तुम्हारा त्याग

दहक रही है आज भी, तुम में बलि की आग

सेवक सैन्य कठोर, हम चालीस करोड़

कौन देख सकता कुभाव से ध्वजे, तुम्हारी ओर

करते तव जय गान, वीर हुए बलिदान

अंगारों पर चला तुम्हें ले सारा हिन्दुस्तान!

प्रताप की विभा, कृषानुजा, नमो, नमो!
नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो!

दिल्ली – रामधारी सिंह “दिनकर” (Dilli – Ramdhari Singh “Dinkar”)

यह कैसी चांदनी अम के मलिन तमिस्र गगन में
कूक रही क्यों नियति व्यंग से इस गोधूलि-लगन में?
मरघट में तू साज रही दिल्ली कैसे श्रृंगार?

यह बहार का स्वांग अरी इस उजड़े चमन में!
इस उजाड़ निर्जन खंडहर में

छिन्न-भिन्न उजड़े इस घर मे
तुझे रूप सजाने की सूझी

इस सत्यानाश प्रहर में!
डाल-डाल पर छेड़ रही कोयल मर्सिया-तराना,

और तुझे सूझा इस दम ही उत्सव हाय, मनाना;
हम धोते हैं घाव इधर सतलज के शीतल जल से,

उधर तुझे भाता है इनपर नमक हाय, छिड़काना!
महल कहां बस, हमें सहारा

केवल फ़ूस-फ़ास, तॄणदल का;
अन्न नहीं, अवलम्ब प्राण का

गम, आँसू या गंगाजल का;

हमारे कृषक -रामधारी सिंह “दिनकर” (Hamaare Krishak -Ramdhari Singh “Dinkar”)

​जेठ हो कि हो पूस, हमारे कृषकों को आराम नहीं है 

छूटे कभी संग बैलों का ऐसा कोई याम नहीं है 
मुख में जीभ शक्ति भुजा में जीवन में सुख का नाम नहीं है 

वसन कहाँ? सूखी रोटी भी मिलती दोनों शाम नहीं है 
बैलों के ये बंधू वर्ष भर क्या जाने कैसे जीते हैं 

बंधी जीभ, आँखें विषम गम खा शायद आँसू पीते हैं 
पर शिशु का क्या, सीख न पाया अभी जो आँसू पीना 

चूस-चूस सूखा स्तन माँ का, सो जाता रो-विलप नगीना 
विवश देखती माँ आँचल से नन्ही तड़प उड़ जाती 

अपना रक्त पिला देती यदि फटती आज वज्र की छाती 
कब्र-कब्र में अबोध बालकों की भूखी हड्डी रोती  है 

दूध-दूध की कदम-कदम पर सारी रात होती है 
दूध-दूध औ वत्स मंदिरों में बहरे पाषान यहाँ है 

दूध-दूध तारे बोलो इन बच्चों के भगवान कहाँ हैं 
दूध-दूध गंगा तू ही अपनी पानी को दूध बना दे 

दूध-दूध उफ कोई है तो इन भूखे मुर्दों को जरा मना दे 
दूध-दूध दुनिया सोती है लाऊँ दूध कहाँ किस घर से 

दूध-दूध हे देव गगन के कुछ बूँदें टपका अम्बर से 
हटो व्योम के, मेघ पंथ से स्वर्ग लूटने हम आते हैं 

दूध-दूध  हे वत्स!  तुम्हारा दूध खोजने हम जाते हैं

रात यों कहने लगा मुझ से गगन का चाँद -रामधारी सिंह दिनकर


रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,
आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है!

उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,

और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है ।

जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?

मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते;

और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी

चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते ।

आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का;

आज उठता और कल फिर फूट जाता है;

किन्तु, फिर भी धन्य; ठहरा आदमी ही तो?

बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है ।

मैं न बोला, किन्तु, मेरी रागिनी बोली,

देख फिर से, चाँद! मुझको जानता है तू?

स्वप्न मेरे बुलबुले हैं? है यही पानी?

आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू?

मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते,

आग में उसको गला लोहा बनाती हूँ,

और उस पर नींव रखती हूँ नए घर की,

इस तरह दीवार फौलादी उठाती हूँ ।

मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी

कल्पना की जीभ में भी धार होती है,

बाण ही होते विचारों के नहीं केवल,

स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है ।

स्वर्ग के सम्राट को जाकर ख़बर कर दे,

“रोज़ ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे,

रोकिए, जैसे बने इन स्वप्नवालों को,

स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे ।”

शक्ति और क्षमा – रामधारी सिंह दिनकर(Shakti aur Shama-Ramdhari Singh Dinkar)

क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल
सबका लिया सहारा
पर नर व्याघ्र सुयोधन तुमसे
कहो, कहाँ कब हारा ?

क्षमाशील हो रिपु-समक्ष
तुम हुये विनत जितना ही
दुष्ट कौरवों ने तुमको
कायर समझा उतना ही।

अत्याचार सहन करने का
कुफल यही होता है
पौरुष का आतंक मनुज
कोमल होकर खोता है।

क्षमा शोभती उस भुजंग को
जिसके पास गरल हो
उसको क्या जो दंतहीन
विषरहित, विनीत, सरल हो।

तीन दिवस तक पंथ मांगते
रघुपति सिन्धु किनारे,
बैठे पढ़ते रहे छन्द
अनुनय के प्यारे-प्यारे।

उत्तर में जब एक नाद भी
उठा नहीं सागर से
उठी अधीर धधक पौरुष की
आग राम के शर से।

सिन्धु देह धर त्राहि-त्राहि
करता आ गिरा शरण में
चरण पूज दासता ग्रहण की
बँधा मूढ़ बन्धन में।

सच पूछो, तो शर में ही
बसती है दीप्ति विनय की
सन्धि-वचन सम्पूज्य उसी का
जिसमें शक्ति विजय की।

सहनशीलता, क्षमा, दया को
तभी पूजता जग है
बल का दर्प चमकता उसके
पीछे जब जगमग है।

कथनी – करणी का अंग -कबीर (kathni karni ka ang by Kabir)

जैसी मुख तैं नीकसै, तैसी चालै चाल।
पारब्रह्म नेड़ा रहै, पल में करै निहाल॥

पद गाए मन हरषियां, साँखी कह्यां अनंद।
सो तत नांव न जाणियां, गल में पड़िया फंद॥

मैं जाण्यूं पढिबौ भलो, पढ़बा थैं भलौ जोग।
राम-नाम सूं प्रीति करि, भल भल नींदौ लोग॥

`कबीर’ पढ़िबो दूरि करि, पुस्तक देइ बहाई।
बावन आखर सोधि करि, `ररै’ `ममै’ चित्त लाई॥

पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढ़ाई आखर प्रेम का, पढ़ै सो पंडित होइ॥

करता दीसै कीरतन, ऊँचा करि-करि तुंड।
जानें-बूझै कुछ नहीं, यौं हीं आंधा रूंड॥