ऐसे मैं मन बहलाता हूँ – हरिवंशराय बच्चन (Aise mai mann behlaata hoon – Harivansh Rai Bachhan)


​सोचा करता बैठ अकेले,

गत जीवन के सुख-दुख झेले,

दंशनकारी सुधियों से मैं उर के छाले सहलाता हूँ!

ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!
नहीं खोजने जाता मरहम,

होकर अपने प्रति अति निर्मम,

उर के घावों को आँसू के खारे जल से नहलाता हूँ!

ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!
आह निकल मुख से जाती है,

मानव की ही तो छाती है,

लाज नहीं मुझको देवों में यदि मैं दुर्बल कहलाता हूँ!

ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!

ध्वज-वंदना – रामधारी सिंह “दिनकर” (Dhwaj Vandana- Ramdhari Singh “Dinkar”)

नमो, नमो, नमो…
नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो!

नमो नगाधिराज-शृंग की विहारिणी!

नमो अनंत सौख्य-शक्ति-शील-धारिणी!

प्रणय-प्रसारिणी, नमो अरिष्ट-वारिणी!

नमो मनुष्य की शुभेषणा-प्रचारिणी!

नवीन सूर्य की नई प्रभा, नमो, नमो!

नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो!
हम न किसी का चाहते तनिक, अहित, अपकार

प्रेमी सकल जहान का भारतवर्ष उदार

सत्य न्याय के हेतु, फहर फहर ओ केतु

हम विरचेंगे देश-देश के बीच मिलन का सेतु

पवित्र सौम्य, शांति की शिखा, नमो, नमो!

नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो!
तार-तार में हैं गुंथा ध्वजे, तुम्हारा त्याग

दहक रही है आज भी, तुम में बलि की आग

सेवक सैन्य कठोर, हम चालीस करोड़

कौन देख सकता कुभाव से ध्वजे, तुम्हारी ओर

करते तव जय गान, वीर हुए बलिदान

अंगारों पर चला तुम्हें ले सारा हिन्दुस्तान!

प्रताप की विभा, कृषानुजा, नमो, नमो!
नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो!

दिल्ली – रामधारी सिंह “दिनकर” (Dilli – Ramdhari Singh “Dinkar”)

यह कैसी चांदनी अम के मलिन तमिस्र गगन में
कूक रही क्यों नियति व्यंग से इस गोधूलि-लगन में?
मरघट में तू साज रही दिल्ली कैसे श्रृंगार?

यह बहार का स्वांग अरी इस उजड़े चमन में!
इस उजाड़ निर्जन खंडहर में

छिन्न-भिन्न उजड़े इस घर मे
तुझे रूप सजाने की सूझी

इस सत्यानाश प्रहर में!
डाल-डाल पर छेड़ रही कोयल मर्सिया-तराना,

और तुझे सूझा इस दम ही उत्सव हाय, मनाना;
हम धोते हैं घाव इधर सतलज के शीतल जल से,

उधर तुझे भाता है इनपर नमक हाय, छिड़काना!
महल कहां बस, हमें सहारा

केवल फ़ूस-फ़ास, तॄणदल का;
अन्न नहीं, अवलम्ब प्राण का

गम, आँसू या गंगाजल का;

हमारे कृषक -रामधारी सिंह “दिनकर” (Hamaare Krishak -Ramdhari Singh “Dinkar”)

​जेठ हो कि हो पूस, हमारे कृषकों को आराम नहीं है 

छूटे कभी संग बैलों का ऐसा कोई याम नहीं है 
मुख में जीभ शक्ति भुजा में जीवन में सुख का नाम नहीं है 

वसन कहाँ? सूखी रोटी भी मिलती दोनों शाम नहीं है 
बैलों के ये बंधू वर्ष भर क्या जाने कैसे जीते हैं 

बंधी जीभ, आँखें विषम गम खा शायद आँसू पीते हैं 
पर शिशु का क्या, सीख न पाया अभी जो आँसू पीना 

चूस-चूस सूखा स्तन माँ का, सो जाता रो-विलप नगीना 
विवश देखती माँ आँचल से नन्ही तड़प उड़ जाती 

अपना रक्त पिला देती यदि फटती आज वज्र की छाती 
कब्र-कब्र में अबोध बालकों की भूखी हड्डी रोती  है 

दूध-दूध की कदम-कदम पर सारी रात होती है 
दूध-दूध औ वत्स मंदिरों में बहरे पाषान यहाँ है 

दूध-दूध तारे बोलो इन बच्चों के भगवान कहाँ हैं 
दूध-दूध गंगा तू ही अपनी पानी को दूध बना दे 

दूध-दूध उफ कोई है तो इन भूखे मुर्दों को जरा मना दे 
दूध-दूध दुनिया सोती है लाऊँ दूध कहाँ किस घर से 

दूध-दूध हे देव गगन के कुछ बूँदें टपका अम्बर से 
हटो व्योम के, मेघ पंथ से स्वर्ग लूटने हम आते हैं 

दूध-दूध  हे वत्स!  तुम्हारा दूध खोजने हम जाते हैं

रात यों कहने लगा मुझ से गगन का चाँद -रामधारी सिंह दिनकर


रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद,
आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है!

उलझनें अपनी बनाकर आप ही फँसता,

और फिर बेचैन हो जगता, न सोता है ।

जानता है तू कि मैं कितना पुराना हूँ?

मैं चुका हूँ देख मनु को जनमते-मरते;

और लाखों बार तुझ-से पागलों को भी

चाँदनी में बैठ स्वप्नों पर सही करते ।

आदमी का स्वप्न? है वह बुलबुला जल का;

आज उठता और कल फिर फूट जाता है;

किन्तु, फिर भी धन्य; ठहरा आदमी ही तो?

बुलबुलों से खेलता, कविता बनाता है ।

मैं न बोला, किन्तु, मेरी रागिनी बोली,

देख फिर से, चाँद! मुझको जानता है तू?

स्वप्न मेरे बुलबुले हैं? है यही पानी?

आग को भी क्या नहीं पहचानता है तू?

मैं न वह जो स्वप्न पर केवल सही करते,

आग में उसको गला लोहा बनाती हूँ,

और उस पर नींव रखती हूँ नए घर की,

इस तरह दीवार फौलादी उठाती हूँ ।

मनु नहीं, मनु-पुत्र है यह सामने, जिसकी

कल्पना की जीभ में भी धार होती है,

बाण ही होते विचारों के नहीं केवल,

स्वप्न के भी हाथ में तलवार होती है ।

स्वर्ग के सम्राट को जाकर ख़बर कर दे,

“रोज़ ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे,

रोकिए, जैसे बने इन स्वप्नवालों को,

स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे ।”

पक्षी और बादल – रामधारी सिंह “दिनकर”


​ये भगवान के डाकिये हैं,

जो एक महादेश से

दूसरे महादेश को जाते हैं।
हम तो समझ नहीं पाते हैं,
मगर उनकी लायी चिठि्ठयाँ

पेड़, पौधे, पानी और पहाड़

बाँचते हैं।
हम तो केवल यह आँकते हैं

कि एक देश की धरती 

दूसरे देश को सुगन्ध भेजती है।
और वह सौरभ हवा में तैरती हुए

पक्षियों की पाँखों पर तिरता है।

और एक देश का भाप

दूसरे देश का पानी

बनकर गिरता है।