मां का प्यार

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Why it is necessary to worship Laxmi ji and Ganesha on Diwali ?

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दीवाली के दिन लक्ष्मी-गणेश की पूजा क्यों।

दीवाली के दिन दशानन रावण पर विजय प्राप्त की थी भगवान राम ने परंतु रात्रि की पूजा होती है भगवती महालक्ष्मी तथा शिव पुत्र गणेश की क्यों? भगवान राम के लंका विजय के बाद अयोध्या में पधारने पर नगरवासियों ने विजय के रूप में दीपमाला उत्सव मनाया था। 

ऐतिहासिक दृष्टिकोण के अनुसार कृषि प्रधान भारत में आज से सहस्रों वर्ष पूर्व इस उत्सव का प्रचलन ऋतुपर्व के रूप में हुआ था। शारीदय फसल पककर घरों में आती है। अन्न भंडार धन-धान्य से भर जाते हैं। जनता अपने हृदय का उल्लास दीप मालिका के रूप में ‘होलोत्सव’ के रूप में मनाते थे। स्कन्द पद्म व भविष्यपुराण के अनुसार महाराज पृथु द्वारा दीन-हीन भारत को अन्न, धन से समृद्ध करने के कारण दीपमालिका मनाना लिखा है। 

आज के दिन समुद्र मंथन से अप्सराओं की उत्पत्ति के पश्चात मां लक्ष्मी प्रकट हुई थीं। इंद्र ने रत्नजड़ित आसन दिया, नदियों ने सोने के घड़ों में स्नान के लिये जल दिया। ऋषियों ने विधिपूर्वक अभिषेक किया। गंधर्वों ने वाधयंत्र बजाये व अप्सरायें नृत्य करने लगी। मेघों ने गर्जन-तर्जन के द्वारा उनकी संगत की। दिग्गज पूर्ण कलशों से मां लक्ष्मी को स्नान कराने लगे। सागर ने पीले न कुम्हलाने वाले वस्त्र दिये वरुण ने वैजयनती माला दी। विश्वकर्मा ने विभिन्न प्रकार आभूषण व पूजित सागर कन्या लक्ष्मी ने अपने हाथों में कमल की माला लेकर हास्यपूर्वक विष्णु के गले में जयमाला डाल दी। 

अप्सराओं ने मंगलगान किया तथा सभी देवताओं ने लक्ष्मी नारारयण की स्तुति की। 

जब श्री कृष्ण ने योग-माया का आश्रय लेकर रासलीला का आयोजन किया तो उनके वाम अंक से एक अत्यंत सुंदर देवी का जन्म हुआ प्रभु इच्छा से उस देवी ने दो रूप धारण किये। एक रूप श्री राधिका का व दूसरा महालक्ष्मी का प्रसिद्ध है। देवराज इंद्र के घर में स्वर्गलक्ष्मी के रूप में पाताल में नागलक्ष्मी, राजग्रहों में राजलक्ष्मी सभी कुलवती स्त्रियों में गृहलक्ष्मी के रूप में लक्ष्मी जी शोभायमान हैं। 

कमलों, रत्न, फल, राजा, रानी, अन्न, वस्त्र शुभस्थान देवी-देवताओं की प्रतिमा, मंगल कलश मणि, मोती, माला, मंगल-सूत्र, हीरा, दूध, चंदन, पेड़ की शाखा व मेघ आदि दिव्य पदार्थों में मां लक्ष्मी शोभा रूप में विराजमान है। 

सबसे पहले नारायण ने बैकुंठ में लक्ष्मी जी को पूजा की थी। दूसरी बार ब्रह्माजी ने, तीसरी बार शिव ने तथा चौथी बार सांगर मंथन के समय पुन: भगवान विष्णु ने लक्ष्मी जी की पूजा की थी। बाद में मनु ने तथा पाताल में नागों ने की थी। 

मार्कण्डेय पुराण में महालक्ष्मी की उपासना के लिये दिपावली की रात्रि का बहुत महत्व बताया गया है। राष्ट्रीय एकता व सदभावना का पर्व दीपावली वास्तव में पंच महोत्सव के रूप में मनाना श्रेष्ठ होता है।

Radha – Krishna Vivah ( राधा-कृष्ण विवाह )

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हम में से बहुत से लोग यही जानते हैं कि राधाजी श्रीकृष्ण की प्रेयसी थीं परन्तु इनका विवाह नहीं हुआ था।
श्रीकृष्ण के गुरू गर्गाचार्य जी द्वारा रचित “गर्ग संहिता” में यह वर्णन है कि राधा-कृष्ण का विवाह हुआ था।
एक बार नन्द बाबा कृष्ण जी को गोद में लिए हुए गाएं चरा रहे थे।
गाएं चराते-चराते वे वन में काफी आगे निकल आए। अचानक बादल गरजने लगे और आंधी चलने लगी। नन्द बाबा ने देखा कि सुन्दर वस्त्र आभूषणों से सजी राधा जी प्रकट हुई। नन्द बाबा ने राधा जी को प्रणाम किया और कहा कि वे जानते हैं कि उनकी गोद मे साक्षात श्रीहरि हैं और उन्हें गर्ग जी ने यह रहस्य बता दिया था। भगवान कृष्ण को राधाजी को सौंप कर नन्द बाबा चले गए। तब भगवान कृष्ण युवा रूप में आ गए। वहां एक विवाह मण्डप बना और विवाह की सारी सामग्री सुसज्जित रूप में वहां थी। भगवान कृष्ण राधाजी के साथ उस मण्डप में सुंदर सिंहासन पर विराजमान हुए। तभी वहां ब्रम्हा जी प्रकट हुए और भगवान कृष्ण का गुणगान करने के बाद कहा कि वे ही उन दोनों का पाणिग्रहण संस्कार संपन्न कराएंगे। ब्रम्हा जी ने वेद मंत्रों के उच्चारण के साथ विवाह कराया और दक्षिणा में भगवान से उनके चरणों की भंक्ति मांगी। विवाह संपन्न कराने के बाद ब्रम्हा जी लौट गए। नवविवाहित युगल ने हंसते खेलते कुछ समय यमुना के तट पर बिताया। अचानक भगवान कृष्ण फिर से शिशु रूप में आ गए। राधाजी का मन तो नहीं भरा था पर वे जानती थीं कि श्री हरि भगवान की लीलाएं अद्भुत हैं। वे शिशु रूपधारी श्री कृष्ण को लेकर माता यशोदा के पास गई और कहा कि रास्ते में नन्द बाबा ने उन्हें बालक कृष्ण को उन्हें देने को कहा था। राधा जी उम्र में श्रीकृष्ण से बडी थीं। यदि राधा-कृष्ण की मिलन स्थली की भौगोलिक पृष्ठभूमि देखें तो नन्द गांव से बरसाना 7 किमी है तथा वह वन जहाँ ये गायें चराने जाते थे नंद गांव और बरसाना के ठीक मघ्य में है। भारतीय वाङग्मय के अघ्ययन से प्रकट होता है कि राधा प्रेम का प्रतीक थीं और कृष्ण और राधा के बीच दैहिक संबंधों की कोई भी अवधारणा शास्त्रों में नहीं है। इसलिए इस प्रेम को Aristocratic Love  की श्रेणी में रखते हैं। इसलिए कृष्ण के साथ सदा राधाजी को ही प्रतिष्ठा मिली।

Bahut kathin hai dagar panghat ki – Amir khusro

बहुत कठिन है डगर पनघट की।
कैसे मैं भर लाऊँ मधवा से मटकी
मेरे अच्छे निज़ाम पिया।
कैसे मैं भर लाऊँ मधवा से मटकी
ज़रा बोलो निज़ाम पिया।
पनिया भरन को मैं जो गई थी।
दौड़ झपट मोरी मटकी पटकी।
बहुत कठिन है डगर पनघट की।
खुसरो निज़ाम के बलि-बलि जाइए।
लाज राखे मेरे घूँघट पट की।
कैसे मैं भर लाऊँ मधवा से मटकी
बहुत कठिन है डगर पनघट की।

Khuda aaj ye faisla kar de

ए खुदा आज ये फ़ैसला करदे, उसे मेरा या मुझे उसका करदे.
बहुत दुख सहे हे मैने, कोई ख़ुसी अब तो मूक़दर करदे.

बहुत मुश्किल लगता है उससे दूर रहना, जुदाई के सफ़र को कम करदे.
जितना दूर चले गये वो मुझसे, उसे उतना करीब करदे.
नही लिखा अगर नसीब मे उसका नाम, तो ख़तम कर ये ज़िंदगी और मुझे फ़ना करदे.